अखबार (Akhbaar)

मेरी लकीरों में गुम था
जो जांनिसार की तरह
वो छोड़ कर गया मुझे
किसी अखबार की तरह

उसकी फुर्सत में अब
मुहाल हुए रहता हूँ मैं
स्याह दामन लिए बेबस
किसी लाचार की तरह

न वो तेवर न रौनक
न बांकपन वो पहला
नम हवा में सिहर जाता हूँ
किसी बीमार की तरह

कर इस्तेमाल मेरा
हर शख्स चला जाता है
फेंक देता है मुझे फिर
चीज़ बेकार की तरह

अपने वज़ूद को हासिल
फिर से पाने के लिए
चंद रुपयों में बिक जाऊंगा
कबाड़ की तरह

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