एलियन बना दिया..
फ़ौज ने फ़ौजी को हरफ़नमौला बना दिया,अनुशासन और तत्परता का पाठ पढ़ा दिया।हर परिस्थिति में बंदे को जीना सिखा दिया,सिविलियन […]
फ़ौज ने फ़ौजी को हरफ़नमौला बना दिया,अनुशासन और तत्परता का पाठ पढ़ा दिया।हर परिस्थिति में बंदे को जीना सिखा दिया,सिविलियन […]
ज़िंदगी कोमैंने कह दिया—जा सिमरन जा,जा जी ले अपनी ज़िंदगी… ज़िंदगी….ज़िंदगी होमवर्क और किताब बन गई थी,नौकरी की पढ़ाई का
हे देअर!हे यू!हे! आई ऍम टॉकिंग तो यूओह! हेलो अंकल हाउ डू यू डूतुम छोटा मेमना तू हमारा बरबरी करता
[परिचय][अकोस्टिक गिटार का स्ट्रम, क्लीन इलेक्ट्रिक गिटार प्रमुख धुन] [पद्य 1][पुरुष आवाज में प्रवेश]खाया है धोखा टूटा है दिल बार
रोज़ की तरह भगते-भगते मैं मेट्रो में चढ़ गया,सीट मिली नहीं मुझे मेरा बस मुँह सड़ गया। एक बंदा उँगलियाँ
[Intro]समोसे को देखा होगा दोस्तों तुमनेशाही अंदाज़ में सजे मुड़े हैं कोनेताज सजा सर कितना इठलाता हैसबका फ़ेवरेट बूढ़े बच्चे
एक नजर मेरी तरफ तू देख तो लेपहलू में मुझे अपने ज़रा रख तो लेगोली बीपी की मैं रखुंगी ठीक
बन्ना खड़ा मुँह बनाये खाना घर का उसको न भायेरोटी सब्ज़ी से नैन चुराये पिज़्ज़ा बर्गर बस वो उड़ायेबन्ना खड़ा
घर बैठुंगा कल से शायर हो जाऊँगायारो मैं कल से रिटायर हो जाऊंगाबिन करंट वाला वायर हो जाऊँगायारो मैं कल
तुम कहती हो —WhatsApp है मगर में देखती नहींअक्सर कह देती हो—“मैं तो WhatsApp देखती ही नहीं,”कि जैसे कोई ताज
सभ्यताएँ वो तबाह हुईंजब सब मिलजुल बैठा करते थे,सुख-दुख में रहते साथघर एक-दूजे के जाया करते थे। शादी-ब्याह, जन्मदिन होया
पुरानी तस्वीर की डीपी लगाए बैठा हूँ,बुढ़ापे से इस तरह मुँह छुपाए बैठा हूँ।जवानी छोड़ गई है दामन कब का,जवाँ
आज फनिवार है दिल्ली को खुमार हैछुट्टी है आराम कर रही चिंता न विकार है पांच दिन दोड़ी है दिल्लीजैसे
“आठ बजे की मेट्रो प्यारे, जब जब तुझको ले जायेगी…धिक्चिक धिक्चिक धिक्चिक धिक्चिक धिक्चिक धिक्चिक ले जायेगी…” “मौजपुर की ओर
लगा था कि शायदमैं भूल गया हूँ तुमको,लगा था कि तुम चले गए होऔर लौटकर नहीं आओगे। दिल मेंएक अजीब-सा
मैं वही हूँ, सब कुछ पहले जैसा हीबस समय बदल गया—अब वैसा नहींवो जादूगर कहीं दफ़न हो गया हैहाथों का
“हाँ… आजकल ऐसा ही है।” वह यूँ ही बात कर रहा था—किसी विषय पर,किसी मित्र से। मैं उसे जानता नहीं
ऐ गांधी तेरी टोपी कहाँ गईखुद पहनते हो न गैर कोईआज दिल में ख़याल आयाखाली मन में शैतान आया अपने
तुम पर मैं क्या गुज़रा हूँमैं तो खुद से ही गुज़रा हूँजो एक पल को ठहरा थाजाता हुआ मैं वो
घर में सब लेकिन हम तन्हा और बस हैं दीवारेंशब्द निठल्ले घूमते हैं कोई नहीं जिसे पुकारेंघर हो गया कैदखाना