तुम क्या जानो, चुन्नी बाबू!

एक जामुन की कीमत
तुम क्या जानो, चुन्नी बाबू,
बीमार मानसिकता और बेलगाम
लालच जब हो जाएँ बेकाबू।

एक झुंड ही बर्बाद कर देता है
पत्तियाँ, पेड़, टहनी और समूल।

शिकारी झुंड नीचे खड़ा था,
एक लड़के को पेड़ पर चढ़ा दिया था।

झुंड ने नीचे से उकसाया,
लड़का जोश में आ गया—जवानी का जोश था।

पेड़ को अबला समझ
तहस-नहस कर डाला जामुन के लिए।

नीचे लालच हँस रहा था,
जामुन एक-एक करके लूट रहा था।

और लड़का ऊपर
ताबड़तोड़ सरिए से वार किए जा रहा था।
शाखा, पत्तियां और जामुन गिराए जा रहा था

झुण्ड ने सब लूट लिया
नीचे जब लड़का उतरा,
उसके हाथ आया सिर्फ़ एक जामुन।

वो भी—
जो झुंड की नज़रों से बचकर
झाड़ी में जाकर दुबक गया था।

पेड़ अपनी फलदायिनी प्रकृति को
और भगवान को कोसता रहा।

झुंड के लालच और
लड़के के जोश-जुनून ने
लूट ली उसकी आबरू।

एक जामुन की कीमत
तुम क्या जानो, चुन्नी बाबू!

माली जब डंडा लेकर आया,
झुंड वहाँ से नदारद हो चुका था।

लड़का पकड़ा गया,
मगर माली ने अबोध समझकर छोड़ दिया।

न लालच पकड़ा गया,
न झुंड,
न लड़का,
न वह मानसिकता।

रह गया बर्बाद
जामुन का पेड़—
होकर बेआबरू।

एक जामुन की कीमत
तुम क्या जानो, चुन्नी बाबू!

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