नयी सुबह (Nayi Subah)

ज़िन्दगी एक दिन और ढलने को है

सुहानी रात ये अब ढलने को है

एक नयी सुबह निकलने को है

आज की भट्टी में जिस्म और रूह

कतरा कतरा पिघलने को है

ज़िन्दगी एक दिन और ढलने को है

आईने के सामने खुद को सजाना है

शराफत का नया मुखौटा लगाना है

रूह का कोई मेकअप नहीं शायद

झूठ और जुनूं इसे फिर निगलने को हैं

ज़िन्दगी एक दिन और ढलने को है

इंसां को नहीं औकात को देखना है

ऊंचा किसी को नीचा देखना है

किसी पर हसना किसी से शिकायत

तीर सब ये ज़हरीले चलने को हैं

ज़िन्दगी एक दिन और ढलने को है

शाम तक यही सिलसिला देखो तो

न जाने कितना कहर डालेगा

ज़हर को तो आखिर ज़हर ही मरेगा

पैर लड़खड़ाकर फिर सँभालने को हैं

ज़िन्दगी एक दिन और ढलने को है

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