रोज़ की तरह भगते-भगते मैं मेट्रो में चढ़ गया,
सीट मिली नहीं मुझे मेरा बस मुँह सड़ गया।
एक बंदा उँगलियाँ घिस-घिस आग जला रहा था,
बालों से गंजा था शायद बाल उगा रहा था।
एक कन्या हेडफ़ोन लगा बातों में मशगूल थी,
कन्या के रूप पे मेरा मन कुलाँचें भर रहा था।
कन्या ने जो घूरा मुझे—तो भगता मन अड़ गया,
अपनी नाकामी पर मेरा बस मुँह ही सड़ गया।
रोज़ की तरह भगते-भगते मैं मेट्रो में चढ़ गया,
सीट मिली नहीं मुझे—मेरा बस मुँह सड़ गया।
घूमी नज़र—एक नर दाँत में स्टिक फँसा रहा था,
माल को दुष्ट वो गाड़ी की सीट पे लगा रहा था।
ऐसी हरकत देख मेरा तो मसला ही बिगड़ गया,
अगले स्टेशन पर मैं, ब्रो, दूसरे कोच में चढ़ गया।
रोज़ की तरह भगते-भगते मैं मेट्रो में चढ़ गया,
सीट मिली नहीं मुझे—मेरा बस मुँह सड़ गया।
आगे जब सीट मिली—तो मैं आँख मूँद सो गया,
ऐसा सोया कि स्टेशन मेरा पीछे ही छूट गया।
भगदड़ में उतरा—तो कन्या से कंधा रगड़ गया,
गाली उसने दी—मेरा मुँह कुछ और सड़ गया।
रोज़ की तरह भगते-भगते मैं मेट्रो में चढ़ गया,
सीट मिली नहीं मुझे—मेरा बस मुँह सड़ गया।
किस्मत की लकीरें मेट्रो के मैप सी उलझी हैं,
सुकूं की ‘सीट’ मिली ‘मंज़िल’ पीछे रह गया
रोज़ की तरह भगते-भगते मैं मेट्रो में चढ़ गया,
सीट मिली नहीं मुझे—मेरा बस मुँह सड़ गया।