लिखने का मन नहीं था
मायूस कलम ने अर्ज़ किया
इससे पहले कि शाम ढले
तू बोतल को लगा ले गले
किसी की याद में खो जाए
बेवफा गैर का हो जाए
हाथ थाम मेरा, मुझे उठा
खूं ए रंग में. मुझे डुबा
कुछ तू कह कुछ मैं लिखूं
आजा तेरा गम बाँट लूँ
मैं मिट जाऊं तू मर जाए
क्यों न एक एक हो जाए
मैंने कहा सुनो ऐ कलम
खेल लो मुझसे ही तुम
मैं तो शायर बदनाम हूँ
भुला हुआ एक नाम हूँ
दिले बर्बाद ख़ाक हो जाए
तेरा ही मन बहल जाए
लिखावट मेरा पैमाना है
नशा बोतल में कैद न हो पाए
चल एक एक हो जाए
