मेरे माथे के चूल(MMKC)

आज में गंजा हूँ

कढ़ैया मंजा  हूँ 

मेरे माथे के चूल मुरझा गए हैं

डंड्रफ केमिकल मेरे जवानी के शौक

दीमक की तरह इनको खा गए हैं

बिस्तर पर इनकी मैयत पे रोता हूँ अब सुबहो शाम

क्यों गिर जाते

नहीं लहलाहाते

ज़िन्दगी के सफर में बिछड़ जाते जो सर के बाल

वो फिर नहीं आते

फिर नहीं आते      

वैद ढूँढा था

ऑनलाइन देखा था

जब मिला मुझसे भी ज्यादा वो गंजा था

मैंने उल्टे कदम घर को मोड़ लिए

जो खुद अपनी फसल से महरूम है

खुशी देगा कैसे मेरे बालों  के लिए

पहन कर विग घूमता हूं बिंदास अब सुबहो शाम

भीतर लजाते

ऊपर मुस्कुराते

ज़िन्दगी के सफर में बिछड़ जाते हैं जो सर के बाल

वो फिर नहीं आते

फिर नहीं आते     

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