मैं तो अजर अमर हूँ!
पर शरीर जो दे दिया है
इसका मैं क्या करूँ
कैसे झगड़े दूर करूँ
अंगों में रोज़ ठनती है
कैसे मैनेज करूँ
दिल्ली में गर्मी बहुत है
हालत पतली की हद है
अब दो दिन से बारिश है
जिसकी सबको ख्वाहिश है
क्या तुझे भी…
अरे नहीं…
मैं तो अजर अमर हूँ
कल तक जब गर्मी थी
स्नान की होड़ मचती थी
पहले लोटे के लिए
अंगों में झड़प होती थी
पानी मुझपे डाल
अरे पहले यहाँ डाल
गर्मी में मर गया
अबे मुझपे डाल
हम क्या पागल हैं
जो कुछ नहीं कहते
हमारे ऊपर डाल
सुनता नहीं है क्या
साले यहाँ ला डाल
हम बाप हैं सबके
पहले हम पे डाल
क्या तुझ पर?
अरे नहीं..
मैं तो अजर अमर हूँ
दो दिन से बारिश है
पानी में आई ठंडक है
ठंड जैसी ठंडक है
अब मामला उलटा है
कन्फ्यूज मेरा लोटा है
हाथ उठाता हूँ जब
झगड़ा हो जाता है
अबे मुझपे नहीं बे
अरे नहीं बे नहीं बे
मुझपे मत डाल
पहले उस पर डाल
सुनता नहीं है क्या
अबे बावला है क्या
बात भेजे में डाल
भीगे कान हुआ स्नान
चल कान पे डाल
साले फेंक दे लोटा
वर्ना दम घोट दूँगा
चल भाग यहाँ से!
पानी फर्श पे डाल
और निकल…
क्या करूँ मैं सूखा ही
लोटा पटक कर
बाहर आ जाता हूँ
कौन तू
अरे नहीं
मैं तो अजर अमर हूँ
