अबे हटा सावन की घटा…एक ग़ज़ल(AHSKG)

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किसी की बात इतनी गहरी लगी दिल में
बन गयी दिल का गुबार वो

वो बोलकर अपनी राह पर निकल गया
मगर बाँध ली गांठ में मैंने वो

कौन था वो मुझे ये भी तो पता नहीं है
शैतान मगर मुझको लगा वो

अहम मेरा जो आसमान से भी ऊंचा है
उसको घायल कर गया वो

अब आंखें मेरी कुछ और नहीं देख पातीं
ज़ेहन लॉक कर गया है वो

उसका चेहरा ही सिर्फ बस मेरे सामने है
बी पी ऊपर कर गया है वो

खुद को ही कहीं न भस्म मैं कर डालूं
भस्मासुर मुझे बना गया वो

मैंने खुद को न जाने क्या समझ लिया
एक तिनके सी हैसियत है

ब्रह्मांड अनंत अथाह है सुन दिल मेरे
तेरा अहम ब्रह्मांड नहीं है

अहम् की अपने सुन तू बत्ती बना ले
थूक दे गुस्सा, उम्र बढ़ा ले

सर को झटक कर चल पानी पी ले
और ग़म हैं उन्हें पटा ले

कह दे अहम् से…
और गुबार से…

अबे हटा सावन की घटा…

खा खुजा के
बत्ती बुझा के
सो जा…

निंटुकले…
पिंटुकले…

मंडी पे खडेली है अंटी…

बजा रही है
बार बार घंटी…

कुल्ला घुमा के
पश्चिम को पलट ले…

बहुत हो गया…

फूट ले…
वट ले…
कट ले…

शाना बन क्या…

चल हट…

अब्बी…

आपुन को…

हव्वा…

आने दे…

हव्वा आने दे…

दिल को ज़रा…

समझा लेने दे…
चल हट…

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