ईश्वर के दर पर कोई लॉगिन नहीं है,
लॉगिन नहीं… और लॉजिक भी नहीं है।
हर होनी में कारण ढूँढना तेरी आदत है,
बिन कारण जो होता है, वही तो ईश्वर है।
बिन कारण, किसी लॉजिक से परे है,
मगर वही हमारी आती-जाती साँस है।
हवा है, पानी है, प्रकृति है,
और मन में हर लम्हा जगती
एक दबी हुई आस है।
एक फूल, एक फल
या जो प्रसाद तुमने चढ़ाया है—
बस वही लॉगिन है।
इसके बाद की प्रोसेसिंग,
राम, रोम, रिएक्शन और आउटपुट—
लॉगिन, लॉजिक और प्रोसेसिंग के बाहर है।
जहाँ तुम खड़े होते हो,
अगर वहीं से लाइन शुरू होती है,
तो जहाँ तुम्हारी सोच खत्म हो जाती है—
वही सरज़मीं
उस ऊपरवाले मालिक का डोमेन है।
