मैं मेहमां बन चला आता हूँ
तुम्हारी डोरबैल बजा देता हूँ
दरवाज़ा दोस्त खोलता है
मैं बैठक में चला आता हूँ
तुम कितनी हो व्यस्त रसोई में
यह कहाँ कोई देखता है
पहले ही खट रही कितना
सरोकार कोई नहीं रखता है
बैठक में से बढ़िया चाय का
हुक्म कानों तक जाता है
मन तुम्हारा कचोटता होगा
इतने काम हैं, लो अब और एक
तुम मुंह बनाने लगती होगी
खुद ही झुंझलाने लगती होगी
कामों की जो लिस्ट बनाई है
फिर उसे टटोलने लगती हो
कह भी देती होगी मन ही मन…
अब एक और आ गया…
लो…
पहले ही ढेरों काम हैं घर में
निठल्ला एक और आ गया…
तुम पहले से ही कितनी उलझी
चकरी बन घूमती हो
नहीं कोई देखता यह तुम
खुद में गुमशुदा फिरती हो
मुंह बनाकर फिर से अपने
कामों में व्यस्त हो जाती हो
स्माइल ओढ़ कर बढ़िया चाय
बिस्किट संग ले आती हो
मेरा तुमसे अलबत्ता
कोई रिश्ता तो नहीं है
अहसान मगर तुम्हारा है
तुमने सदियों की परम्परा को
सर माथे रख जो निभाया है
तुम सरस्वती सी जलधारा
धरा धरा उर में बहती जाती हो
आंखों से ओझल रहकर भी
धरातल सींचे जाती हो
तुम सरस्वती सी जलधारा
सदियों की प्यास बुझाती हो…
सदियों की प्यास…
बुझाये जाती हो…
