तुम पर चाहे मेरा हक़ अब न हो,
दुआ-सलाम पर मगर अब भी है।
लाख हो गए हो किसी और के,
दिल आशना तुमसे अब भी है।
दिल होता था कभी घर तुम्हारा,
धड़कनों में तेरा नाम अब भी है।
वो बेसाख़्ता हमको छू लेना तेरा,
वो कशिश बाजुओं में अब भी है।
हँस देती थी जब मेरी बातों पर,
गूँजती वो ख़ामोशी में अब भी है।
तुम्हारे जाने पर रूह की बेचैनी,
वो ठंडक इन हाथों में अब भी है।
भीगी पलकों के साथ सर तेरा,
मेरे कंधे पे अहसास अब भी है।
तुम पर चाहे मेरा हक़ अब न हो,
इन सौग़ातों पर मगर अब भी है।
