डर के साये में पलकर सहमी सहमी बड़ी हुई
उस घर से इस घर आयी मजबूरी भी साथ हुई
तेरे आने की आहट पर ताने सुने केवल ताने
ख़ामोशी से सब सहते रिश्ते मुझे पड़े निभाने
तेरे वज़ूद पर खतरे की बात से सहम गयी थी
मैं खुदगर्ज नहीं हूँ बेटी बस थोड़ा डर गयी थी
मैं खुदगर्ज नहीं बेटी बस थोड़ा डर गयी थीमैं खुदगर्ज नहीं बेटी बस थोड़ा डर गयी थी
तुझे पढ़ाई करनी थी कदम बढ़ना चाहती थी
भाई के जैसे तू भी आसमान छूना चाहती थी
रस्मों की जंजीरों से तेरे क़दमों को बाँध दिया
मैं तेरी दोषी हूँ बिटिया बहता पानी बाँध दिया
माफ़ मुझे करना बेटी मैं कल में घिर गयी थी
मैं खुदगर्ज नहीं बेटी बस थोड़ा डर गयी थीअपने घर आज चली वो घर आबाद करेगी
वादा कर डर के साये में खुद न बर्बाद होगी
अपने बच्चों के सपनों को ज़रूर पूरा करना
डर को उनके सपनों पर न हावी होने देना
मेरे जैसी न बनना जो डर से जो डर गयी थी
मैं खुदगर्ज नहीं बेटी बस थोड़ा डर गयी थी
