सम्राट (SMT)

घर की दहलीज़ पर एक सुंदर बालक बैठा है,
बालक ईश्वर का एक रूप है—ये सच लगता है।

दहलीज़ किसी बड़े घर की नहीं,
दिल्ली में किसी गरीब के
किराये के छोटे-से एक कमरे की है,
जहाँ ईश्वर साक्षात बैठा है।

कभी घुटनों पर चलता है,
कभी रुककर देखता है,
जहाँ तक नज़र जाती है,
अपने साम्राज्य को गौर से देखता है।

कुछ महसूस करता है,
फिर उठता है
और अपने राज्य की सीमाओं की
हदें नापने लगता है।

मैं सोचता हूँ—बालक अबोध है, अनजान है,
मगर उसे जिस दुनिया की पहचान है,
वो अलग ही विज्ञान है।

उस देश में कोई दुःख नहीं,
गरीबी नहीं,
अपना-तेरा नहीं।

आँखें भले ठहरी हों उसकी इस जग में,
भीतर जारी चलचित्र विशाल है,
जिसे लीला कहते हैं।

नाटक तो हम भी रोज़ खेलते ही हैं,
घर से ही मुखौटा लगाकर चलते हैं।
जो हम नहीं हैं,
वही तो ओढ़ लेते हैं—
अच्छा बेटा,
सज्जन पुरुष
और सभ्य नागरिक।

इस जग के नाटक में
व्याधि, क्लेश और लाचारी है,
आधी खुशियाँ हैं
और ज़िंदगी आधी है।

मन को बहलाने के लिए,
सुकून पाने के लिए,
हमें नशे का साथ चाहिए।

जबकि वो बालक
उस दुनिया में पहले से ही
एक साम्राज्य का शासक है।

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