अनवरत बहती दुनिया में एक अमिट छाप अपनी भी हो
होनी के पन्नों में दाखिल कुछ भले कारज अपने भी होंवह जीवन भी क्या जीवन है आये जग में और चले गए
जो हाथ भलाई के लिए उठें दो हाथ उनमें अपने भी होंमानव रुप में जन्म लिया मानव हित के हम काम करें
तेरे कर से खुद के न केवल पूर्ण और स्वप्न भी होंगांधी जी का समस्त जीवन परमारथ की गाथा है
‘पीर पराई जाने रे’ से उद्देश्य कुछ अपने भी होंसुबह शाम माला जपते ईश्वर के दरस न पाते तुम
मानव सेवा माधव सेवा तुम नारायण अपने ही होअनवरत बहती दुनिया में एक अमिट छाप अपनी भी हो
होनी के पन्नों में दाखिल कुछ भले कारज अपने भी हों
