श्रीकृष्ण उवाच:
जीवन है पार्थ एक महाभारत आरम्भ जो है तो अंत भी है
आरम्भ जो तेरे हाथ नहीं तो अंत भी तेरे वश नहीं है
क्यों व्यर्थ है शंका में डूबा हे पार्थ तू निज गांडीव उठा
यह युद्धभूमि है कर्मभूमि रणकौशल बस कर्त्तव्य तेरा
मैं आदि में हूँ अनादि में हूँ वर्तमान भविष्य मैं ही हूँ
तुझ में मैं, मैं प्रियजनों में सकल पितरों में केवल मैं हूँ
मारूंगा मैं मरूंगा भी मैं कर कर्म तू अपना धर्म निभा
यह युद्धभूमि है कर्मभूमि रणकौशल बस कर्त्तव्य तेरा
पंचभूत से प्रकट हुआ यह शरीर ही केवल नश्वर है
निराकार आत्मा मैं हूँ जो अजर अमर और शास्वत है
फिर किसके प्राण हरेगा तू पथ भ्रष्ट न हो संदेह मिटा
यह युद्धभूमि है कर्मभूमि रणकौशल बस कर्त्तव्य तेरा
अर्जुन उवाच:
आभार प्रभु स्वीकार करें सत्य का ज्ञान प्रकाश किया
विमुख हुआ था कर्त्तव्य से मैं दे उपदेश कृतार्थ किया
खींची प्रत्यंचा अर्जुन ने रण नाद से अम्बर गूंज उठा
योद्धा अर्जुन सारथी कृष्ण रथ युद्ध पथ पर दौड़ चला
