वह गिर गया था सड़क पर टकराने के बाद
उसकी बाइक को मारा था सामने से बस ने
आया उसे याद
बहुत दर्द था शायद कई हड्डियां टूट गयी थीं
सर में चोट थीं सड़क भी खून से भर गयी थी
साँझ ढले दिल्ली दफ्तर से घर लौट रही थी
हर शख्स को अपने घर लौटने की जल्दी थी
कुछ राहगीरों ने मदद का हाथ भी बढ़ाया था
उसे और बाइक को सड़क किनारे लगाया था
दर्द के साये में याद आता था उसे अपना घर
ठीक होता तो पहुँच जाता अब तक तो उधर
बेटी छोटे पांवों से दौड़ कर दरवाजा खोलती
लिपट जाती गले से उसके और जेब टटोलती
पत्नी के पास जाने से पहले माँ के पास जाता
कुछ सुनता माँ की दिन भर की अपनी सुनाता
बाबूजी रोज की तरह ज्ञान बघारते हुए मिलते
जो वे अक्सर ही किया करते हैं मिलते मिलाते
पत्नी को मिलता, सरप्राइज में नई साड़ी देता
सेल में से ली है कहकर उसे खुश कर देता
वह हंस कर कहती इसकी क्या ज़रुरत थी
मेरे पास पहले कई रखी हैं मैं ये कह रह थी
यह सोचकर मगर उसकी अंतरात्मा रो पड़ी
बदकिस्मती शायद ले आयी थी अंतिम घड़ी
डूबती साँसों के बीच उसने कुछ आवाजें सुनी
‘अरे भाई उठाओ चलो अभी सांस चल रही है’
किसे पता था ज़िन्दगी हाथ से फिसल रही है
