खुद भूखी है परवाह नहीं
परिवार को पहले खिलाती है
बच्चों की ख़ुशी में खुश होती
दुःख अपना नहीं बताती है

सबसे जल्दी जगने वाली
आखिर तक ही सो पाती है
घर की बेटी न जाने कब
बेटी से माँ बन जाती है

बचपन में गुड्डे गुड़ियों को
लोरी थपकी दे सुलाती थी
कभी पापा की कभी भाई की
पल में मम्मा बन जाती थी

सब पर स्नेह बरसाती पर
हक़ अपना नहीं जताती है
घर की बेटी जाने कब
बेटी से माँ बन जाती है

देवी है वह अन्नपूर्णा
इस संसार की पालक है
बेटा जो घर का चिराग
तो बेटी घर की रौनक है

अपनी किस्मत वह संग लाती
दो घर के भाग्य जगाती है
घर की बेटी जाने कब
बेटी से माँ बन जाती है

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