पत्थर ध्यान करते हैं
अपने भीतर सहेजकर
वे भगवान रखते हैं।”
दिल में यादों का कोना
जहां माता पिता बसते हैं
ज़मीन सदा सीली रहती
और मिट्टी वहां की
हमेशा गीली रहती है
मुझे फुर्सत कहां
जो मैं ठहर कर
तुमसे पुछूं कि
बताओ मेरा हुनर
तुम्हें कैसा लगा
जाना है मुझे
उस पार जहाँ के
जहां सुकूं ओ सलीके से
रहता है ऊपरवाला
ज़रा हाथ मिलाना है
उससे…
दुनिया की नज़रों से
बचने की खातिर
दीवारें हमने सर बुलंद
कर तो दी हैं
आलम ये है कि
इतने तनहा हुए हैं
हस्ती हमारी हमें
ही तलाशती है
उम्र का किसी से
रिश्ता नहीं
मगर हर रिश्ते की
उम्र होती है
बाल गोरी के एक रोज़
क्या खुले रह गए
ऐसे उलझे हम
सब भूले रह गए
दूल्हा बनने का शौक
ऐसा चरमराया
जलते हैं रात दिन..
कसम से हम तो
चूल्हे हो गए
तरक्की का यहाँ
कभी दौर नहीं आया
रिश्तों और बातों में
सोज़ नहीं आया
छोटे शहर से हैं हम
मगर छोटे नहीं हैं
नातों को नोटों में
तोलने का हुनर
हमें नहीं आया
बड़े लोगों के जश्न
चला करते हैं तहखाने में
भर भर शराब मिलती है
मयखाने में
बातें वो आपस से
कम ही किया करते हैं
प्लेट चम्मच चीखते हैं
दस्तरखाने में
जितनी तेरे दर्द की
बारिश होती है
जितनी मेरे जुनून की
आजमाईश होती है
उतनी ही तुझे पाने की
मुझे ख्वाहिश होती है
जिंदगी हमको है तुझसे
इश्क़ बेशुमार
कहते है इसकी
ना नुमाइश होती है
वो चुपचाप सब कुछ
सहता रहा
अलग खुद की दुनिया
में घुटता रहा
खाक होने पहले से
राख के ढेर में
सूनी आंखों से
सबको तकता रहा
कभी कभी
कब्र का कर्ज
सब्र के खर्च पर
अमादा होता है
समझ नहीं आता
सब्र पाएं या फिर
कब्र में जाएं
अखलाक मेरे थे
एहसास मेरे थे
ज़ज़्बात मेरे थे
हलात भी मेरे थे
था खेल मेरा और
मजमा भी मेरा
मिलने आए जो मुझसे
सब खास मेरे थे
उसने कभी किसी से
कुछ कहा ही नहीं
कहना भी चाहा उसने तो
कोई समझा नहीं
तुम्हारी दी हर चीज़
संभाल रखी है हमने
खामोश सब सहने की
मिसाल रखी है हमने
फुहारों में भीगना
सिर्फ तुम्हारे साथ था
अब तो बिना बारिश
छतरी तान रखी है हमने
परम पूज्य मातेश्वरी
श्री ऐ आई सुनो ना
पाप की मटकी में
अलार्म लगा दो न
पाप जब बढ़ जाए
मटकी भरने आए
उससे पहले ही
एक बजर बजाये
और आवाज़ ये आये
सावधान,
पाप की मटकी,
आपकी भर गई है
कृपया कपट, बंद करें
मटकी अब बस
फूटने वाली है
आपकी पतंग
कटने वाली है
कुछ हमारी ज़ुबाँ साफ़ न थी
कुछ वो ऊँचा सुनते थे।
कहते-सुनते हम बातों की
गफलत मेँ हँस लेते थे।
जो पेड़ तूफानों को
ठेंगा दिखा दिया करते थे
धूप, गर्मी, तूफानों में
सीना ताने खड़े रहते थे
वक़्त की मार से लाचार
ज़मीनदोस्त हो गए हैं
हलकी बूँदाबादी के
इश्क मेँ गिर गए हैं
ज़रूरतें थीं नेमतें थीं
फुरसतें थीं मोहब्बतें थीं
दौलतें हैं हैसियतें हैं
शिकायतें हैं नफ़रतें हैं
होने वाली मुलाकात के
मैं तार बुनता रहा
कुछ उसकी सुनूंगा
कुछ अपनी कहूंगा
मैं सोचता रहा
वक्त वो मगर ज़िंदगी में
कभी आया ही नहीं
कंबख्त ने मुझे अपने घर
बुलाया ही नहीं
तमाम दर- ओ- दरीचा
मेरा महकने लगा है
जब से गुंचा किसी और
के बगीचे का लगा है
वक़्त फिसल रहा हाथों से
जान निकल रही साँसों से
किसका है इंतज़ार बन्दे
नसीब न बने सिर्फ बातों से
जिस मूरत ने
एक नज़र न देखा मुझको
मेरी चाहत ने
उस पत्थर को
खुदा बना दिया
संध्या के सूरज को देखा
काली रात के बिस्तर पर
दिन भर घिसट घिसट
थक गया था चलते चलते
रंग सुनहरी चादर ओढ़े
ऊँघ रहा था मुंह ढक कर
तुझसे बढ़कर मेरा
कोई महबूब नहीं
तेरे बिना ओ मेरे खुदा
मेरा वजूद नहीं
ऐ ताज़ा सुन्दर फूलों की माला
तेरा कोई नहीं है यहाँ रखवाला
ताज़ा थे फूल देवों का साथ था
मुरझाये तो कचरा बना डाला
राख से बने थे हम राख की तरह जले
राख बन कर ही चले जाना है सजन
कुफ्र मत तोलो खुदा के पास जाना है
कभी कभी मज़बूरी इतनी बढ़ जाती है
कि पूरी ज़िन्दगी भी छोटी पड़ जाती है
शहर के शोरगुल से दूर किसी कोने में
चीखती हुई खामोशी कोहराम मचाती है
जो दुनिया रहने को हमें कमीनी लगी
ऊंचाई पर पहुंच कर गज़ब हंसीं लगी
कुत्ते को तुमने और भी कुत्ता बना दिया
कचरे से झूठन ज़रा वो जो खा लेता था
उसको भी लोहे के ढक्कन से ढक दिया
एक दर्द जिसने दिल को छलनी कर दिया
एक ज़िद ने आंसुओं का दरिया लांघ दिया
एक जूनून जिसको जला कर रौशनी की
इस तरह हमने सपनों को फिर रंग लिया
छोटी छोटी बातें हम भूल गए थे
खेल खिलौने सारे कहीं छूट गए थे
आँगन की मिट्टी में जो पैर पड़े थे
उनमें बचपन के कितने राज़ जुड़े थे
बचपन तेरी छाँव में खिल सके थे हम
बाक़ी या तो उम्र गुज़री है या खुद हम
इश्क के दाग
दिल पर पुराने लगे
ज़ख्मों को सुखाने में
हमें ज़माने लगे
याद उन दिनों की
जो कभी सुहाने लगे
दौर ए ज़िक्र
जब जब किया
ज़माने को कम्बख़्त
सब बहाने लगे
बातों बातों में बातों से निकलती हैं बातें
अपनी कहते रहो सुनते चलो उनकी बातें
बातों से मिल जाते सब सवालों के जवाब
बातों से सुलझते मसले और कडवी बातें
बातचीत चलती रहे जब तक रहे तल्खी
मलाल न हो वक्त रहते न कर पाए बातें
लड़कपन हम किस दौर से गुज़र जाते हैं
कितने नादां थे हम ये अब जान पाते हैं
हर खूबसूरत चेहरे पे दिल का आ जाना
नाकाम मोहब्बत में हंसना रोना रुलाना
दग़ाबाज़ महबूब के जलवे अब हंसाते हैं
कितनी मासूम थी ये अब सिर्फ बातें हैं
मोटी बेडोल बच्चों को ले जब चलती है I
ये बोझ अपने सर नहीं बस खैर मनाते हैं
बड़ों से सीख मिली बचपन में
अच्छे बनो सुबह जल्दी उठो
ईश्वर में हो विश्वास पुण्य करो
ईमानदार बनो झूठ मत बोलो
जो बड़ा आदमी बनना है तो
जो कहा था उसने सब किया
बड़े होकर वो बस क्लर्क बना
जरूरतें ही बस पूरी कर पाया
हाँ उम्र से वो बड़ा होता आया
रोज़गार छीन लो व्यापार छीनो
मंहगाई से कुचलो टैक्स से मारो
आम जन को उसमें दफना दो
जब सड़ जाए उसे गरीब बताओ
गरीबी बता कर गरीब को हटाओ
रोंदो मसलो हांशिये पर ले आओ
तब जाकर ही खुशहाली चमकेगी
विकास की गति दिनों दिन बढ़ेगी
इंसां को इंसां नहीं ग़ुलाम चाहिए
उसे सब अपने हिसाब से चाहिए
गाड़ी में रखने को बेजान खिलौने
गर्दन घुमाते कुत्ते व बन्दर सलोने
कुछ न मांग करने वाले माँ बाप
दिवंगत इंसां की तस्वीरों में छाप
इंसां को इंसां नहीं ग़ुलाम चाहिए
उसे सब अपने हिसाब से चाहिए
भगवत अंश अस्थियों में कैद हुआ
मन की चंचलता ने उसे कष्ट दिया
तुम्हारे कर्मों की कालिखों ने मगर
उसकी सजा को सौ गुना कर दिया
ऐ दर्द तेरा शुक्रिया
तू मुझको बहलाता रहा
दुनिया ये सितमगर है
एहसास कराता रहा
बेशक हर लम्हा मुझ पर
मौत का एहसान था
में ज़िंदा हूँ अभी
तू याद दिलाता रहा
किसने दिया कैसे मेरी
हर हद में समाया तू
था वो कोई खास
तू मुझको बताता रहा
