एक समय था, जब धरती और समंदर साथ-साथ रहते थे।
कालांतर में प्रकृति ने दोनों को अलग-अलग
ज़िम्मेदारियाँ सौंप दीं भिन्न भिन्न जीवों की रक्षा के लिए।
दुनिया और समस्त जीवों के हित के
लिए धरती और समंदर ने अपने मन
की नहीं, अपने धर्म की सुनी।
धरती दोनों छोटे बेटों,भूकंप और ज़लज़ला के साथ—
और समंदर बड़ी बेटी सुनामी के साथ रहने लगा
समय बीतने लगा…
हर शाम, जब सूरज ढलने लगता,
समंदर किनारे पर आ जाता और धरती भी
अपने दोनों बेटों को लेकर वहां आ बैठती।
वे दोनों बातें करते रहते और
तीनों बच्चे साथ साथ हँसते खेलते रहते।
भूकंप जो तीनों बच्चों में सबसे छोटा था
रेत उछालता।
ज़लज़ला जो उससे बड़ा था,
सीपियाँ चुनता।
और सुनामी जो दोनों से बड़ी थी
छोटी-छोटी लहरों से उनके पैर भिगोया करती।
धरती और समंदर दूर बैठे उन्हें देखते
रहते और बातें करते।
एक रोज़ खेलते-खेलते भूकंप ने
शोर सुना और जब ऊपर देखा तो
आसमानी बच्चे मस्ती में खेलते हुए
जा रहे थे।
आँधी भाग रही थी।
बवंडर गोल-गोल घूम रहा था।
बादल इधर-उधर दौड़कर,
बारिश मचा रहे थे ।
बर्फ़बारी भी ऊँचे पहाड़ों पर
लहरा कर मस्ती में झूम रही थी।
भूकंप यह सब देख कर दौड़कर
माँ के पास आया और
मासूमियत से बोला—
“माँ… हम क्यों नहीं बाहर खेलने जाते?”
सुनामी की आँखें भी भूकंप की
बात सुनकर चमक उठीं।
“हाँ! धरती माँ हम भी खेलने जाएँगे।
ज़लज़ला बोला —
हम भी दौड़ेंगे…
हम भी कूदेंगे…
और पूरी दुनिया घूमेंगे।”
और!
भूकंप बीच में ही बोल पड़ा —
“हाँ माँ…
आँधी…
बादल…
बर्फ़…
सब खेलते हैं…
हमें भी जाना है…”
धरती मुस्कुराई. समंदर ने गहरी साँस ली।
धरती ने तीनों बच्चों को पास बिठाया।
और बोली,
“मेरे बेटों…
और प्यारी बेटी सुनामी…
ध्यान से सुनो।
आँधी दौड़ती है तो कुछ पत्ते टूटते हैं।
तूफ़ान आता है तो कुछ पेड़ गिरते हैं।
बारिश होती है तो धरती मुस्कुरा उठती है।
बर्फ़ गिरती है तो पहाड़ सफ़ेद चादर ओढ़ लेते हैं।
प्रकृति की हर शक्ति की अपनी सीमा होती है।
लेकिन…
तुम तीनों की ताक़त की कोई सीमा नहीं।”
तीनों बच्चे चुपचाप सुनते रहे। कुछ पल्ले नहीं पड़ा.
धरती आगे बोली—
“अगर तुम खेलने निकलोगे…
तो घर बिखर जाएँगे…
शहर टूट जाएँगे…
नदियाँ रास्ता बदल लेंगी…
जंगल उजड़ जाएँगे…
और न जाने कितने लोग रो पड़ेंगे।”
सुनामी ने धीरे से पूछा—
**”लेकिन धरती माँ…
हमारा भी तो मन करता है…”**
समंदर पहली बार बोला—
“बेटी…
तुम खेलोगी…
तो लहरें खेल नहीं रहेंगी।
वे किनारे निगल जाएँगी।
और तुम्हारे दोनों भाई…
अगर खेलेंगे…
तो मुझे भी तो चोट आएगी।”
भूकंप ने सर खुजाया…
और पूछा—
“फिर?”
धरती बोली—
“बहुत से परिवार उजड़ जाएँगे।”
“फिर?”
“बच्चे अपनी माँओं से बिछड़ जाएँगे।”
“फिर?”
समंदर की आँखें नम हो गईं।
“मैं अपने किनारे खो दूँगा।”
“फिर?”
धरती की आवाज़ भर्रा गई।
वह तीनों बच्चों को देखती रही।
धीरे से बोली—
**”और…
शायद…
मैं और तुम्हारे समंदर पिता…
दोनों ही अस्तित्व खो दें और
शायद दुनिया ही ख़त्म हो जाए…”**
भूकंप ने पहली बार गौर से माँ का चेहरा देखा।
आँखों में आँसू भर आए, वह
माँ से लिपट गया।
ज़लज़ला धरती का आँचल
पकड़े सहम गया।
सुनामी खामोश बैठी थी।
भूकंप आँसू पोंछ कर
धीरे से बोला—
**”माँ…
अगर हमारे खेलने से तुम्हें चोट लगेगी…
तो मैं कभी नहीं खेलूँगा…
तुम कहीं मत जाना…”**
ज़लज़ले ने भी सिर हिला कर कहा,
“हाँ माँ…
सुनामी ने ज़लज़ला और भूकंप का
हाथ पकड़ कर कहा—
“धरती माँ…अगर हमारे खेलने से आप दोनों को
नुक्सान होगा तो हम खेलने ही नहीं जाएंगे,
आप हमेशा हमारे साथ रहना बस”
धरती ने तीनों बच्चों को सीने से लगा लिया।
समंदर बहुत देर यह दृश्य देखता रहा।
उसने महसूस किया…
उसकी बेटी अब बड़ी होने लगी है।
