जुबां बोले जा रही थी—न रुकावट, न खेद,
न ज्ञान साथ दे रहा था, न ही विवेक।
जुबां ने कैंची से चलने का डिप्लोमा किया था,
काटते रहो—ये न देखो कि क्या काट डाला!
इस बार जुबां के शिकार हुए दो कान थे,
बड़े शातिर थे—एक सुनता, तो दूसरा ठेल देता।
जुबां चले जा रही थी—
लपर लपर… लपर लपर…
“अरे अंकल! गैस ही कारण है सब रोगों का,
इसी से पेट की सारी बीमारियाँ पैदा होती हैं,
इसी से नींद नहीं आती,
इसी से आदमी चिड़चिड़ा रहता है…”
यह कहते हुए जुबां ने
ज्ञान और विवेक की ओर देखा।
दोनों आराम से मस्त पड़े थे,
खर्राटे ले रहे थे।
दो कानों वाला पेट
जुबां की बात से चौंका, भनभनाया,
और गैस—जो उसकी मुँहबोली बहन थी—
उसे गुस्से में घर से निकाल दिया।
ऐसा बवंडर उठा
कि जुबां वाली नाक ने तुरंत सरेंडर कर दिया।
घबराकर अपनी जान की भीख माँगती हुई
वह भागी…
मगर जान बचाते हुए भी जुबां कह रही थी—
“लाइक और सब्सक्राइब करना न भूलना!”
और उधर…
सुन रहा है न विक्रम तू…
ज्ञान और विवेक
अब भी खर्राटे ले रहे थे।
