रास्ते में मस्ती में चला जा रहा था,
शायद कोई धुन गुनगुना रहा था।
नज़र आए एक लड़का, एक लड़की,
बारिश के बाद का नज़ारा था।
लड़की ने एक झोला पकड़ा था,
लड़के ने भी झोला पकड़ा था।
दोनों ने ही झोला पकड़ा था—
मामला मेरी समझ से बाहर था।
थैला था या कोई समझौता,
या प्रेम का कोई इकरार था?
हाथों में था हाथ और झोला,
प्यार का सुंदर इज़हार था।
लड़का तेज़ चला जाता था,
लड़की पीछे भागी जाती थी।
और बीच में बेचारा झोला—
जिसकी शामत आती थी।
चितवन फट-फट जाती थी,
लड़की खिंची चली जाती थी
किसी सामान की तरह।
मेरी नज़र पड़ी जब झोले पर,
अटक ही मैं गया लिखावट पर।
मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था—
FREE HOME DELIVERY
कौन किसको है आखिर
डिलीवर करने जा रहा?
कौन किसको है आखिर
डिलीवर करने जा रहा?
पढ़ते ही भेजे का फ़्यूज़ उड़ा,
दिल का ढक्कन लूज़ हुआ।
निकला पूरा गोलमाल नया,
सारा रोमांस कूरियर हुआ।
लड़का बोला, “चलो जल्दी,”
लड़की बोली, “रुको ज़रा!”
झोला बीच में हिचकोले खाए,
किसका पता, किसका घर भला?
कौन किसको है आखिर
डिलीवर करने जा रहा?
कौन किसको है आखिर
डिलीवर करने जा रहा?
मन ने मुझसे कहा—
“बिरजू, तू इतना क्यों हैरान है?
इश्क़ के बाज़ार में भी
आजकल ऑफ़र महान हैं!”
आज का प्यार भी कमाल है,
दिल पर डिस्काउंट बेहिसाब है।
एक को ले जाओ, एक मुस्कान पाओ,
साथ में झोला मुफ़्त जनाब है!
कौन किसको है आखिर
डिलीवर करने जा रहा?
प्यार है या सेल का पैकेज,
कौन घर तक पहुँच रहा?
ऑफ़र खत्म होने से पहले,
दिल का ऑर्डर कर जाना—
पता सही हो, नाम सही हो,
वरना फिर लौट के आना!
