आप जन्म लेते हैं—ओके।
आप बड़े होते हैं—ओके।
आप कुछ लोगों के साथ बड़े होते हैं,
आप कुछ चीज़ों के साथ बड़े होते हैं।
ओके।
मगर आप कुछ नामों और
रिश्तों के साथ भी बड़े होते हैं।
नहीं समझे?
आप मम्मी, पापा, भाई, बहन—
इन रिश्तों के साथ बड़े होते हैं।
ओके?
आप घर के सामान
और समाज के साथ बड़े होते हैं, है न?
ओके।
तो दोस्त, रिश्तेदार, समाज—
जिन्हें आपने रूबरू देखा है,
उनके साथ-साथ बड़े होते हैं।
ठीक है फिर?
इसके अलावा आप कुछ
अनजान नामों और रिश्तों के साथ भी
जनाब बड़े होते हैं।
नहीं समझे?
जैसे—
दूर के रिश्तेदार की लड़की,
दोस्त की सुंदर बहन,
दूर की मौसी की कज़िन,
मौसी, मामी, भाभी इत्यादि…
जिनसे आप कभी मिले नहीं,
जिन्हें आपने जीवन में कभी देखा नहीं।
ओके फिर?
तो ये लोग आपकी कहानी के
वे पात्र हैं
जिनसे आप जीवन में कभी नहीं मिलते।
हाँ, सही है… आगे?
तो क्या मैं यह कहूँ
कि कायनात इन लोगों के बारे में
आपको पहले से इशारा दे रही है?
इन नामों और रिश्तों के ज़रिए…
कि अगले जन्म में
यही लोग आपके असली
सगे-संबंधी होने वाले हैं?
सोचिए…
जिसे इस जन्म में
आपने कभी देखा तक नहीं—
हो सकता है अगले जन्म में
वही सुबह-सुबह आपके घर आकर बोले—
“उठो बेटा, मैं तुम्हारी
पिछले जन्म की मौसी हूँ!
और अब मैं तुम्हारी भाभी हूँ ”
और आप सोचें—
“अबे… ये तो
बिरजू बावरा सही कहता था!”
