फुर्सत (Fursat)

कभी फुर्सत में जब बैठे सिलसिले पास आ बैठे
लौट आये हंसी लम्हेजो बिताये संग यादों के

ज़िक्र छेड़ा फिर होले से मचलती इन हवाओं ने
दास्ताँ अपने रिश्ते की जब महकी थी फ़िज़ाओं में

तुम्हें मिलने से पहले याद आता है वो आलम
जब हमसे दूर होता था बहारों का हंसी मौसम

बेसबब ही लगता था सुबह की धुप का आना
बेअसर चमन में खिलती कलियों का मुस्काना
झलक पाने को एक तेरी हमारा इंतज़ार करना
नज़र हम पर कब हो तेरी बस यही सोचते रहना

तसव्वुर में हमारे तेरा वो तस्वीर बन आना
तेरे मिलने से जैसे हो किसी ज़न्नत का मिल जाना

आज भी साथ तुम हो बस है  दरमियां दूरी
फुर्सत नहीं तुमको तो है अपनी भी मजबूरी

जुदा जो हो गयीं राहें किनारा कर लिया तुमने
गुजरे वक़्त की मानिंद भुला हमको दिया तुमने

मेरी दोस्ती में दोस्त शायद ख़ुलूस अब न हो
यार तुमको मिले नए मेरी ज़ुस्तज़ू न हो

क़यामत तक मगर देखेंगी नज़रे आप रास्ता
खुली रहेंगी ये बाहें खातिर आपकी वाबस्ता

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