तावड़े को बिंदास बनने की बड़ी जल्दी थी
मुंबई क़दमों पर ले आने की ख्वाहिश थी
बड़े बोल थे उम्र थी कच्ची मगर जोश फुल
उसके और इरादों के बीच सिर्फ आई थी
बिना बाप का बेटा था आँखों की बीनाई थी
यार टपोरी बिगड़े नवाब के ऐब बताते थे
दारू सिगरेट मटका संग खेलने ले जाते थे
शुरुआत में तावड़े ने साफ़ मना कर दी थी
कहता आई मेरे लिए कितना मेहनत करती
शाम को अपुन के इंतज़ार में अन्न नहीं लेती
इसलिए जो करेगा मैं आई से पूछ के करेगा
साला तुम लोग फ़ोर्स नको करो मार डालेगा
एक दिवस तावड़े के मन में जाने क्या आया
आकर बोला भाई अपुन आई से पूछ आया
आई बोली ठीक जो करना है सोच के कर
मैं रोकती नहीं तुझे मगर सब लिमिट में कर
वो दिन था जब तावड़े ने आकर ये सब कहा
उसके बाद वो ज़िन्दगी भर कहीं नहीं रुका
मैं उसे देखा करता था बस देखता रह गया
तावड़े येड़ा बनने की सब हदें तोड़ता गया
सालों बाद मिला अस्पताल में फाइल साथ
एड्स हो गया अपुन को यार हो गया बर्बाद
ज़िन्दगी चलती रही खबर आयी एक दिन
तावड़े दुनिया छोड़ गया था माँ से पूछे बिन
