मुर्गी का अंडा (Murghi Ka Andaa)

दौड़ दौड़ कर उड़ उड़ कर
शब्द ओ हरफ़ चुन लेती है
मेरी मन मुर्गी हर रोज़
एक अंडा दे देती है

तितली जैसी मंडराती है
फूल फूल उपवन उपवन
भँवरे की गुंजन लेकर
उसमें पिरोती है धड़कन
अंडे में से मेरी कविता
बन ठन दर्शन देती है

मेरी मन मुर्गी हर रोज़
एक अंडा दे देती है

चींटी जैसी परिश्रमी
चीनी के दाने ढोती है
मेरी कविता में उसकी
सब मिठास भर देती है
रसभरी मेरी कविता
हर रस का आनंद देती

मेरी मन मुर्गी हर रोज़
एक अंडा दे देती है

आगे चलकर अंडे का
भाग्य न जाने क्या होगा
कविता इसमें उपजेगी या
आमलेट बस फ्राई होगा
इन संशयों से बेख़बर
कर्म की शिक्षा देती है

मेरी मन मुर्गी हर रोज़
एक अंडा दे देती है

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