स्याह रात (Syaah raat)

ग़म संभलता नहीं दम निकलता नहीं
स्याह रात ये क्यों काटे कटती नहीं है
तेरी खुश्बू से घर अब भी लबरेज है
ये महक दिल से क्यों हटती नहीं है

तुमसे होता था रोशन कभी जहां
घने अंधेरे क्यों ये सिमटते नहीं हैं
लम्हे कभी जब हम तुम साथ थे
क्यों कंबख्त फिर पलटते नहीं हैं

आँखें पथराईं धड़कन थम रही है
जान तेरे बगैर निकलती नहीं है
आ जाओ कि सांस थमने लगी है
मौत आगोश में लेती क्यों नहीं है

आजा एक बार आकर तो देख जा…

ग़म संभलता नहीं दम निकलता नहीं
स्याह रात ये क्यों काटे कटती नहीं है
तेरी खुश्बू से घर अब भी लबरेज है
ये महक दिल से क्यों हटती नहीं है

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