सखी री आज ग़ज़ब हुई गवा
कप चाय का हमसे टूट गवा
कैसे सखी ग़ज़ब ऐसा हुआ
किस कारण कप टूट गवा
नींद गहरी सोई थी मैं सखी
सुबह कब हो गई पता नहीं
भैया तुम्हारे ने चाय बना दी
लाकर हाथ हमरे थमा दी
कहे चाय लो ठंडी हो जाय
खा लो तबीयत बिगर जाय
नींद बहुत हमें गहरी लगी
कप हाथ में लिया सो गई
होश सखी ठिकाने न रहा
कप छूटा हाथ से छूट गवा
कप टूट गया चाय गिर गयी
हाल मेरा क्या बताऊँ सखी
नींद में ही चाय साफ करी
ऐसी थकी कि फिर सो गई
एक बात सखी तू सच बता
भैया से कह के काम करवा
मदद तेरी क्यों नहीं करते
ऐसे तो घर नहीं चला करते
हाथ तेरा क्यों नहीं बंटाया
फर्ज है क्यों नहीं निभाया
अब क्या तुझे बताऊँ सखी
आत्मा दुखती है कहती नहीं
मतलब नहीं मैं जियूं या मरूं
जो करूँ मैं अकेली ही करूँ
नहा धोकर चाय देते हैं बस
तीन टाइम लंच पकाएं बस
बर्तन सफाई कोई काम है
कपड़े धोकर सुखाते हैं बस
मेरी फीलिंग की ख़ाक पड़ी
निभा रही मैं अकेली सखी
कप टूटा सफ़ाई मैंने करी
जनाब देखने भी आए नहीं
क्या ये प्यार है? मुझे बता
हाँ वो तुझे प्यार नहीं करता
