कचरे वाली गाड़ी जब-जब भी द्वार पे आए,
असली मर्द वही जो कचरा डाल के आए।
घर का सारा कचरा शहर ठिकाने लगाए,
मिडिल क्लास शौहर इससे कैसे बच पाए!
नहा-धो, इत्र लगा, बन-ठन ऑफिस जाए,
बड़े-बड़े पदों पर बैठ चाहे हुक्म चलाए।
अफसर या मुलाज़िम, नाकारा नज़र आए,
सच्चा पति वही जो कचरा फेंकता जाए।
जीवन की खुशियों में सफ़ाई सर्वोत्तम है,
कचरे वाले ज़ांबाज़ों को सलाम नमन है।
आपके ही बूते हम शुद्ध सांस ले पाएँ,
कचरे वाले मर्द, आपका दर्द समझ पाएँ।
हम शहर वाले कचरा पैदा करते रहते हैं,
चौबीस घंटे, सातों दिन आप सेवा में रहते हैं।
धूप या बारिश, या सर्द तूफानी हवाएँ,
आपकी मेहनत से शहर स्वच्छ मुस्कुराये।
