क्या हो अगर.. (KHA)

क्या हो अगर मैं सब कुछ गंवा बैठूँ तो
मैं, जो शिखर से शिफर पर आ बैठूँ तो
क्या हो अगर मैं सब कुछ गंवा बैठूँ तो

मेरा वजूद जो है, बेशक मिट ही जाएगा
ज़माने में रुतबा है वो खाक हो जाएगा
सोचता हूँ! क्या लाया था जो छिन जाएगा
खाली हाथ थे, जब दुनिया में आया था
यहीं से पाया! यहाँ का यहीं रह जाएगा
सब जानते हुए ग़म दिल से लगा बैठूँ तो
मैं, जो शिखर से शिफर पर आ बैठूँ तो

शिखर की परिभाषा और सीमा है क्या
शिफर की गहराई कोई ले पाया है क्या
खुद के लिए हमने जाल बिछा दिये हैं
पंछी की तरह कैद पछताए जा रहे हैं
सब जानते हुए ग़म दिल से लगा बैठूँ तो
इन बातों से खुद को न बहला सकूँ तो
मैं, जो शिखर से शिफर पर आ बैठूँ तो

क्या हो अगर मैं सब कुछ गंवा बैठूँ तो
मैं, जो शिखर से शिफर पर आ बैठूँ तो
क्या हो अगर मैं सब कुछ गंवा बैठूँ तो

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