प्रेम ही भगवान् है (Prem Hi Bhagwaan Hai)

बहुत होंगे जग में महले दुमहले
गगनचुंबी आलीशान सजीले रुपहले
जेठ मास की जलती तपती दोपहरी में
दे आसरा राही को घर वही महान है

अपनी अपनी शर्तों पर लोग जीते हैं
शान-ओ-शौकत का दिखावा करते हैं
क्या बड़ी बात जिए खुद के लिए
पीर पराई में जिए पुरुष वो महान है

जैसी रहे भावना वैसी होती भक्ति है
आडम्बर में नहीं साधना में शक्ति है
धर्म मार्ग पे चलकर स्वयं का उत्थान,
सत्य आत्मसात करे संत वह महान है

मात पिता पुत्र पत्नी या बन्धु बांधव
प्रेम नहीं तो फिर क्या रहे सबब
प्रेम ही पोषक सींचता है सृष्टि को
है सार जीवन का प्रेम ही भगवान् है

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