अभिनेता कैमरे के आगे बहरूप दिखलाते हैं,
पंडित जी गेरुआ पहनकर बड़ा तिलक लगाते हैं।
नेता जी मंच पर चढ़कर लंबे भाषण सुनाते हैं,
दुनिया में सब अल्हैदा पहचान बनाना चाहते हैं।
करतब और ढंग ये लोगों को दिखाने के लिए हैं,
बिना मोबाइल दिखने वाली रील के लिए हैं।
रील आज की नहीं बात, इतिहास ये पुराना है,
मकसद तो ख़ुद को कुछ अलग दिखलाना है।
अनगिनत लाइक्स और सब्सक्राइबर्स पाना है,
बेशक, इनकम का एक ज़रिया भी बनाना है।
स्वांग रचाना है,
ऑनलाइन मज़मा लगाना है,
रील का ज़माना है,
न कि फ़ील का ज़माना है।
कॉमन अगर है कोई, तो वह आम इंसान है,
जिसकी न कोई औकात है, न कोई पहचान है।
रील बनाते जाओ, दिखो, आसमान छू जाओ,
सीढ़ी चढ़ने का फ़ंडा आज का नहीं, पुराना है।
स्वांग रचाना है,
ऑनलाइन मज़मा लगाना है,
रील का ज़माना है,
न कि फ़ील का ज़माना है।
अनगिनत लाइक्स और सब्सक्राइबर्स पाना है,
बेशक, इनकम का एक ज़रिया भी बनाना है।
पॉपुलैरिटी में जुदा अंदाज़ से पेश आना है,
राजा हो, संत हो, नेता हो या अभिनेता—भाई!
सबको वायरल होना है, अलग दिखाना है!
स्वांग रचाना है,
ऑनलाइन मज़मा लगाना है,
रील का ज़माना है,
न कि फ़ील का ज़माना है।
