चोट लगी ऊँगली दिखाता था मुझको
बातें दिल की सब बताता था मुझको
दर्द ज़िन्दगी के अब छुपाने लगा है
बेटा अब दूर मुझसे जाने लगा हैगले लगकर मुझसे मांगें मनवाता था
फरमाइश कर सब चीज़ें मंगवाता था
संकोच में रहकर मन छुपाने लगा है
बेटा अब दूर मुझसे जाने लगा हैदुनिया जिसकी बस मुझमें समायी थी
बेटे से ज़्यादा हमने यारी निभाई थी
फर्क यारी में अपनी अब आने लगा है
बेटा अब दूर मुझसे जाने लगा हैशक्तिमान उसका हल्क था मैं तो
हीरो था जिसका जादूगर था मैं तो
फर्क जीरो का मुझे समझाने लगा है
बेटा अब दूर मुझसे जाने लगा हैमोबाइल पर यारों से बात बनाता है
खुद जाता है दोस्त घर पर बुलाता है
मुझसे बस वो बहाने बनाने लगा है
बेटा अब दूर मुझसे जाने लगा हैयाद आते हैं दिन जब मस्ती करते थे
साथ छुट्टी में हम टाइमपास करते थे
बिज़ी हो गया जब से कमाने लगा है
बेटा अब दूर मुझसे जाने लगा हैशिकवा नहीं है ये शिकायत नहीं है
चाहत में उसकी ख़यानत नहीं है
बढ़ना है जीवन ज़िन्दगी यही है
दिल कहता है कुछ गलत नहीं है
अनजाना डर मगर सताने लगा है
बेटा अब दूर मुझसे जाने लगा है
3 thoughts on “बेटा दूर जाने लगा है (Beta Door Jaane Laga Hai)”
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वाह। क्या बात। बेहतरीन रचना।
समय की आपाधापी,
सबकुछ बदल रहा,
ख्वाहिशें,मंजिले,
मौसम और उम्र भी ढल रहा,
कल पढ़ता था अब पढ़ाने लगा है,
हाँ बेटा अब दर्द छुपाने लगा है।
बहुत खूबसूरत रचना , एक पिता के मन की व्यथा आपने बहुत सटीक शब्दों में कही है।
👌👌
दिल को स्पर्श करती है ये कविता । बेहद करीबी।💕💔