एक तुम क्या गए..(ATKG)

पतझड़ के रंग फिर चढ़ने लगे हैं
कपास के फूल पेड़ों से झड़ने लगे हैं
एक बार फिर जम के नींद गुदगुदाएगी
चिड़िया बच्चों को रुई के बिछौने पर सुलाएगी

मेरे आँगन में उगाए ऐ नन्हे पौधे
स्वागत तेरा समझा तूने अपना मुझे
रूखा सुखा जो है दोनों खा कर जी लेंगे
पानी पानी तू पी लेना हम तो नीट लेंगे

ना तेरी सोहबत में दिल लगे ना तेरे बगैर ही
ना तो तू अपना सा लगे और ना लगे गैर ही
ये कौन सा दयार है हर शख्स अजनबी लगे
एक तुम क्या गए बे-मतलब सी जिंदगी लगे
लोगों को बातें अपनी लगें बिना सर पैर की

हम तुम मिले भी तो रेल की पटरियों के जैसे
कुछ वक्त संग चले फिर मुड़ गया सफर
चाहत के बाग वीरां हुए ना मिल सके ना दूर हुए

ये समंदर यहाँ कभी पहले तो न था
किसने आँसुओं के सैलाब बहाए हैं

ख्वाबों के जहाँ कभी रंग से फूटे थे
बेनूर फ़िज़ाओं के क़लीन बिछाए हैं

ये समंदर यहाँ कभी पहले तो न था…
ये समंदर यहाँ कभी पहले तो न था…

ये समंदर यहाँ कभी पहले तो न था
किसने आंसुओं के सैलाब बहाए हैं
ख्वाबों के जहां कभी रंग से फूटे थे
बेनूर फ़िज़ाओं के क़लीन बिछाए हैं

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