कुत्ते! ओ कुत्ते!
ओ कुत्ते!
घूर के क्या देखता है?
ये तो बता आख़िर तू
पूँछ हिलाकर क्यों बैठता है?
कुत्ते! ओ कुत्ते!
ओ कुत्ते!
अब्बा हमारे कहते-कहते
मर गए कि तू हमसे कहीं अच्छा है।
सफ़ाई-पसंद है तू, इसलिए
पूँछ हिलाकर बैठता है!
इतना सफ़ाई-पसंद है,
तो कपड़े क्यों नहीं पहनता है?
या कोई और राज़ है इसमें,
क्यों ऐसी हरकत करता है?
हमको अब्बा की और ख़ुद की
नज़रों में शर्मिंदा करता है!
बता, बता, बता कुत्ते,
पूँछ हिलाकर क्यों बैठता है?
वो तो ये भी कहते हैं
कि तुझे घी हज़म नहीं होता! क्यों?
देख, ग़ुस्सा आ रहा है मुझे,
बता, वर्ना अंकुश बनाकर
तेरा हल्का होना दूभर कर दूँ क्या?
कुत्ता बोला,
“भाई, मुझे तो माफ़ कर दे,
तू बैर न ले।
रात भर ड्यूटी दी है मैंने,
अब तो ज़रा सुस्ता लेने दे!
अब्बाओं से तू तो क्या,
हम सब ही भरपाए हैं,
दिल पे मत ले, जाने दे।
मैंने भी अपने अब्बा अभी
भौंककर अभी भगाए हैं!
तू ही बता, तूने अब्बा को
झाड़ू लगाते देखा है?”
“नहीं!”
“बस गाल बजाते और
हुक्म चलाते ही देखा है!”
तो भाई, सुन!
जब-जब मैं रिलैक्स मोड में होता हूँ,
कोई ख़तरा अगर नहीं है,
तो मैं पावर नैप ले लेता हूँ।
पूँछ मेरी मज़े में हिलती है,
मैं ज़रा आराम कर लेता हूँ!
तुम्हारे बुज़ुर्गों ने ठाली बैठे
जाने क्या-क्या तुकबंदियाँ
जानवरों पर चस्पा दी हैं,
जिनमें न कोई विज्ञान है,
न तथ्य, न सत्य, न ज्ञान है!
अंकुश लगा, चाहे घर से
घी ले आ, मुझे सो जाने दे!
चल, भाग यहाँ से—
भौं! भौं!”
