फौजी जब आया गाँव में लौटकर
नक्शा और कलेवर नया हो गया
घरद्वार खेत खलिहान बंट गए थे
रिश्तेदारों का तेवर बदल गया
बीती हुई यादों में था मन में बसेरा
बदला गाँव कि गलियों का चेहरा
बच्चे बड़े और बड़े बूढ़े हो गए
मिलन का चाव फीका ही ठहरा
दारू की बोतल कैंटीन का सामां
सारे रिश्ते जिसके बिना थे वीरान
बैंक बैलेंस और पेंशन की सौगात
फौजी की थी बस यही पहचान
कल जो थे साथी अंजान से दिखे
अपनों का चेहरा भी धूमिल हुआ
हर कोई मिलता फर्क लिए मन में
‘फौजी साहब’ एक बोतल तो दिला
बचपन की यादें मिट्टी में मिल गई
भावुक फौजी की बगिया उजड़ी
लोगों ने प्यार का मोल लगा दिया
न मानी बात तो किनारा कर लिया
संग के थे साथी अजनबी हो गए
किरदार अपनों के भी छल गए
फौजी घर आया क्या सोचकर
कैसे सब बदला नहीं पता चला
दारू की बोतल कैंटीन का सामां
हुए जिनके बिना सब रिश्ते वीरान
बैंक बैलेंस और पेंशन की सौगात
फौजी की थी बस यही पहचान
