बेफिक्र चल (Befikr Chal)

रुख-ए-हवाओं की कहाँ परवाह किया करते हैं
बाज़ परिंदे हौसलों से उड़ान लिया करते हैं

नेकी बदी के फलसफे पर वक़्त यूँ जाया न कर
कायनात-ए-रहनुमा एक अकेला तू नहीं

गुनहगार तो वो है  जिसका जुर्म साबित हो गया
पलट कर देखो तो हर कालीन नीचे मैला है

दुश्मनों के तंज़ का न गौर कर जाने भी दे
मक्खियॉं आने से हाथी फासला देते नहीं

सोचता ही मैं रहा वह उम्र पूरी जी गया
हर फ़िक्र को धुँए में उड़ाता चला गया

शिकस्ता के साथ रहती ठोकरें रुसवाइयाँ
मंज़िलों के पार अक्सर तोहमतें मिट जाती है

नाम होगा दाम भी शोहरतें और हैसियत
इनके आगे तो हुज़ूर सरकारें भी झुक जाती हैं

4 thoughts on “बेफिक्र चल (Befikr Chal)”

  1. बेहतरीन पँक्तियाँ। लाजवाब।👌👌
    गुनहगार तो वो है  जिसका जुर्म साबित हो गया
    पलट कर देखो तो हर कालीन नीचे मैला है

  2. बहुत सुंदर लिखा आपने । आप मेरी साइट भी विज़िट कर लाइक और कमेंट कर बताएं कि मेरा प्रयास कैसा है । और फ़ॉलो करे🙏🙏

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