तूने छलनी मेरे जिस्म को कर दिया
दर्द रग रग से ले रूह तक भर दिया
जीना दुश्वार है दिल परेशान है
दूर नज़रों से मेरी क्यों जाता नहीं
दर्द सीने से मेरे क्यों जाता नहीं
मेहमाँ कब तक का है क्यों बताता नहीं
दर्द सीने से मेरे क्यों जाता नहींएक अर्सा हुआ दिल पर ये बोझ लिए
साल बीते कई आहें भरते हुए
जिनके कारण से मेहमान तू बन गया
तुझको मुझसे मिला कर किनारे हुए
नस नस दुखती है जब से तू पीछे पड़ा
खीर किसी और की क्यों खाता नहीं
दर्द सीने से मेरे क्यों जाता नहींतेरी सोहबत में मायूस रहता हूँ मैं
देख चेहरा जहाँ वाले हंसते हैं सब
कह सकूँ न किसी से तू आया था क्यों
न पता मुझको ये भी तू जाएगा कब
तुझको क्या मैं कहूं कैसा मेहमाँ हैं तू
मेजबाँ पे तरस जो खाता नहीं
दर्द सीने से मेरे क्यों जाता नहींमेहमाँ चंद रोज ही घर में प्यारे लगें
वैसे भी बिन बुलाया मेहमां है तू
दिल जिगर का लहू सब पी ही गया
अब क्या बच्चे की जां से खेलेगा तू
अब न मुझको सत्ता क्या मेरी हैं खता
घर कोई और तुझको क्यों भाता नहीं
दर्द सीने से मेरे क्यों जाता नहींकितना कोसा तुझे मैंने गाली भी दी
बेइज़्ज़ती का असर तुझ पे होता नहीं
पैर पड़ता हूँ तेरे अब मान जा
मरना पल पल का अब मुझसे होता नहीं
या तो अब जाने दे या मेरी जान ले
मोत का खौफ मुझको डराता नहीं
दर्द सीने से मेरे क्यों जाता नहींबच गयी जां तो वो दिन भी देखूंगा मैं
जब मेरे जिस्म से दूर जाएगा तू
मेहमाँ मेरा हैं बिन बुलाया सही
पगले थोड़ा मुझे भी रुलाएगा तू
गले लगकर कहूंगा मैं शायद उस दिन
छोड़ अपनों को यूँ कोई जाता नहीं
2 thoughts on “दर्द मेहमाँ (Dard Mehmaan)”
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are bhai sahab iska matlab bhi bta do kavita kasar kya h ???
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