शक करती रहना(SKR)

मैं मर्द हूँ, बेदर्द हूँ
मैं नहीं समझता
मुझे दर्द नहीं होता
तुम यूं ही मेरे दिल को
अपने तानों से
रोज के उल्हानों से
ज़ख्म देती रहना
शक करती रहना
ज़रा न बदलना
शक करती रहना

यकीन कैसे दिलाऊँ
क्या तुम्हें बताऊँ
नाज़ों में पली हो तुम
मैं यूं ही भटकता हूँ
तुम्हारी सोच अलग है
मैं बस तर्क देता हूँ
कुरेदती रहना तुम
शक करती रहना
ज़रा न बदलना तुम
शक करती रहना

घर टूट जाए तुम्हें क्या
खाक हो जाए तो क्या
जाऊँ चाहे जान से
तुम अपनी जुबान से
ज़हर घोलती रहना
तुम कभी न बदलना
शक करती रहना

मेरे हर जवाब पर
कर देती सवाल हो
क्या मैं कहूं ऐसा कि
न बवाल हो बोलो!
हां मैं हां मिलाऊँ
वो भी गवारा नहीं
कैसे कहूं तुम्हें कि
मैं आवारा नहीं
कल तक सब फैसले
दोनों ने लिए थे
क्यों हुए सिलसिले
अदालत के लिए
इन बातों से मगर
सरोकार तुम्हें क्या
मुझे कोसती रहना
तुम न बदलना
शक करती रहना

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