सुबह की थाली में

सुबह की थाली में
बिखरी लाली में
जब में जागा हूँ
मेरे पास क्या है
ऊपरवाले की
नेमतें क्या-क्या हैं

ठंडी सुहानी हवा
सांसों को राहत देती
एक रोज़ न मिलेगी
हरे पेड़ों की छाया
ढेर सारी रौशनी
फूलों की सुगंध
तरो ताज़ा करती

कल की थकान को
खुद में समेटे हुए
बिस्तर की सलवाटें
दिलासा देते हुए
फ़िक्र नहीं हम कल
फिर से आ जाएंगे

भरा पानी का गिलास
दे रहा है मुझे आस
कि तू है ख़ास

नाश्ते की थाली में
दूध ब्रेड मक्खन
गर्म चाय की सिप
की होठों पर चुभन
इशारा करती हुई
की आज में जी ले
कल तो न जाने
फिर हो न हो

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