माज़ी (Maazi)

हुई ज़िन्दगी तमाम कोई फिर गुज़र गया
क्या सबब कौन कौन फिर मैयत मेँ गया

आँखें खुलीं थी उसकी अपनों की चाह मेँ
आएगा न कोई दिल मेँ डर घर कर गया

टुकड़ा टुकड़ा जोड़ संजोया था एक जहाँ
एक पल में गैरों के उसे वो नाम कर गया

सजदे किये गए तमाम मांगी गयीं दुआएं
बेअसर सभी दुआओं को कर के वो गया

हुई ज़िन्दगी तमाम कोई फिर गुज़र गया
क्या सबब कौन कौन फिर मैयत मेँ गया

तुमसे है गुज़ारिश न करना उसको याद
गुज़रा हुआ वक्त था वो बस गुजर गया

हुई ज़िन्दगी तमाम कोई फिर गुज़र गया
क्या सबब कौन कौन फिर मैयत मेँ गया

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