गधे को कहाँ पता…

गधे का जनम गधों के बीच हुआ है,
होशियार नहीं—मगर sincere पूरा है।

गधे को कहाँ पता वो गधों में जन्मा है,
माँ गधा, पिता गधा, पूरा कुनबा गधा है।

गधे को नहीं पता कि वो एक गधा है,
जनाब! उसे ये भी कहाँ पता है—
इंसान उसे गधा कह कर हँसता है,
बोझ ढोने की उसे सवारी समझता है।

अपना-अपना गधा खोज लो लादो,
इतना न लादो कि मार ही डालो।

इंसां और गधे में फर्क बहुत बड़ा है—
इंसां खुद को इंसां, उसे गधा कहता है।
मगर गधा खुद को गधा नहीं समझता…

जब तक—

कोई इंसां उस पर सवार नहीं होता,
बार-बार उस पर बोझा नहीं ढोता।

कभी सहलाता है, कभी गाली देता है,
कभी मारता, तो कभी पुचकारता है।

साथ ही दर्द कम करने को उसकी
थकान दूर करने को चारा देता है—

जैसे:
appraisal… increment… incentive…
bonus… promotion… आदि आदि आदि…

गधा कन्फ्यूज़।

कभी हँसता है, कभी रोता है,
कभी पैर पटकता, कभी झुँझलाता है—
मगर छोड़ता नहीं
अपनी sincerity
और honesty…

जो उसे विरासत में मिली है।

इसलिए तो वह गधा है।

बदहवास होकर भी पिस रहा है…

और सवार—
अरे! मैंने manager नहीं कहा…
और न ही officer…

बस अपना उल्लू सीधा कर रहा है।

अब ये उल्लू कहाँ से आ गया?
हे हे हे…

जो तेरा boss तुझे समझता है…

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