मुझे ठंड नहीं लगती
क्योंकि मैं अजर और अमर हूँ
मगर यह जो शरीर है न!
जिसमें मैं अभी कैद हूँ
उसे हर एहसास छूता है
गर्मी में पिघलता है
बारिश में गलता है
और ठंड में सिकुड़ता है
दिल्ली से जब चला मैं इसे लेकर
तो वहाँ पर नवंबर की सर्दी थी
गर्म कपड़ों में लगती सर्दी थी
आते आते मगर इटारसी स्टेशन पर
सर्दी बिन टिकट सवारी की मानिंद
रास्ते में अपना सामान ले उतर गयी
शरीर जो सर्दी में सिकुड़ा हुआ था
रोम रोम अंदर से खिंचा हुआ था
पोर पोर अब इसकी खुद खुलने लगी
सुहानी हवा से तबीयत मचलने लगी
एक भारत देश है एक मेरा शरीर है
दिल्ली और बंगलोर की आबो हवा में
जो अंतर है इस शरीर की तकदीर है
मैं मगर अजर हूँ, अमर हूँ अद्भुत हूँ
बस झोला उठाएँगे और निकल लेंगे।”
