कुछ किताबें…

माँ…
मुझमें ये कैसी खुशबू है
जिसे सूंघकर
सब मुस्कुराते हैं?

बेटी…
ये नए होने की खुशबू है।
अभी तेरे पन्नों पर
वक्त की उंगलियाँ नहीं चलीं।

माँ…
क्या लोग मुझे प्यार करेंगे?

हाँ बेटी…
कुछ तुझे सीने से लगाएंगे,
कुछ बस वक़्त काटेंगे।

कुछ तेरे शब्दों में
अपना अकेलापन ढूँढेंगे,
कुछ तेरे कोने मोड़कर
तुझे अधूरा छोड़ देंगे।

माँ…
क्या मैं हमेशा
ऐसी ही सुंदर रहूँगी?

माँ थोड़ी देर चुप रही…

फिर बोली—

धूल
बहुत लोकतांत्रिक होती है बेटी।
एक दिन
हर किताब पर बैठती है।

माँ…
क्या सब मुझे पढ़ेंगे?

नहीं बेटी…
कुछ सिर्फ तेरा कवर देखेंगे,
कुछ तेरी कीमत पूछेंगे,
कुछ तुझे सजावट बनाकर रख देंगे।

और कुछ…

कुछ तेरे बदन पर
चाय गिराकर
तुझे खुला छोड़ सो जाएंगे।

माँ…
क्या मुझे कई घर देखने मिलेंगे?

हाँ बेटी…
कई हाथ,
कई आँखें,
कई इरादे।

बाज़ार में आई चीज़ों को
सफ़र बहुत करने पड़ते हैं।

माँ…
तुम भी कभी
मेरी जैसी महकती थीं?

माँ हँसी…

ऐसी हँसी
जिसमें रद्दी वाले की तराज़ू
धीरे-धीरे झूल रही थी।

फिर बोली—

मैं भी नई थी कभी।
लोग मुझे भी
बड़े शौक से घर लाए थे।

उंगलियों ने सहलाया,
रातों ने पढ़ा,
कुछ ने समझा,
कुछ ने बस पलटा।

फिर धीरे-धीरे
मेरे पन्नों से
ज़रूरत खत्म होती गई।

और एक दिन…

मैं किलो के भाव बिक गई बेटी।

माँ…
क्या हर किताब का
यही अंजाम होता है?

माँ मुस्कुराई…

नहीं बेटी।

कुछ किताबें
रद्दी में बिक जाती हैं,
और कुछ…

कुछ अपने शब्दों में
इतनी सच्ची होती हैं
कि सदियाँ भी
उन्हें पुराना नहीं कर पातीं।

वे लोगों के हाथों से निकलकर
उनकी प्रार्थनाओं में बस जाती हैं।

फिर उन्हें
अलमारी में नहीं रखा जाता,
माथे से लगाया जाता है।

समय के साथ
वे सिर्फ किताब नहीं रहतीं—

रामायण हो जाती हैं,
कुरआन हो जाती हैं।

वे बिकती नहीं,
पूजी जाती हैं।

किटबी धीरे से बोली—

माँ…
अंजाम जो भी हो,
मगर मुझे
रद्दी नहीं बनना।

मुझे ऐसा लिखना है
कि लोग मुझे
सिर्फ पढ़ें नहीं…

महसूस करें।

मुझे
चलते-चलते
ग्रंथ बनना है माँ।

रामायण सा,
कुरआन सा।

यह सुनकर
माँ मुस्कुराई…

मगर उसकी आँखों में
हल्की नमी उतर आई।

शायद…

हर पुरानी किताब
अपने हिस्से का ग्रंथ
अपनी बेटी में ढूँढती है।

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