ये फ़ासले मैंने चाहे नहीं, बनते चले गए,
मैंने कहा था कुछ, तुम कुछ समझते गए।
मैंने तुमसे जो कहा, तुमने जो भी समझा,
पर तुम जो समझे, मैंने कतई नहीं कहा।
बस यूँ ही नासमझी में बात बढ़ती गई,
अब जो भी कहूँ तुमको, गलत ही होगा।
दिल दुखाने का मेरा इरादा कभी न था,
अनजाने तुमने बात को दिल पे ले लिया।
कोई बात जब नहीं, तो मैं क्यों सफ़ाई दूँ?
सॉरी कहकर मैं खुद को छोटा क्यों करूँ?
फिर सोचता हूँ—तुम्हारा भी दिल रख दूँ,
अहम् आड़े आता है… इसका क्या करूँ?
तुम खुद में हो खोई, मैं खुदी में क़ैद हूँ,
तुम तो रो लेती हो, मैं रोता हूँ बिन आँसू।
इश्क़ की आग कैसी है—बराबर लगी हुई,
जलाती तुम्हें उधर, इधर मुझे निगल रही।
दोनों को ही पता है, फिर एक हो जाना है,
पहल नहीं करनी है—दोनों ने ये ठाना है।
चलो वक़्त पे छोड़ दें, घाव ख़ुद भर देगा,
इश्क़ दोनों को फिर आग़ोश में ले लेगा।
