पानीपुरी फिर ओपीडी(PPFO)

देखे हैं हमने फ़र्ज़ी डॉक्टर बनते,
पानीपुरी बेचते, फिर ओपीडी लेते।

क्या करें डिग्री? क्या डिग्री के खर्चे?
पानीपुरी वाले थे अब इलाज लिखते!

चटनी, मसाला, सोंठ, टिक्की, समोसे,
सीधे मरीज़ों को हैं इंजेक्शन देते!

बापू ने धोया था,
खूब हमको कूटा था,
नंबर कम आए थे,
पेपर छोड़ आए थे।

बापू ने तब अपने
कर्म हमें गिनाए थे—

“पढ़ाई नहीं की तो
पानीपुरी बेचोगे!”

नहीं कहा था बापू ने—
डॉक्टर बन जाओगे!

बीती जवानी कलम घिसते-घिसते,
सूखे गोलगप्पे-सी पेंशन लेते।

देखे हैं हमने फ़र्ज़ी डॉक्टर बनते,
पानीपुरी बेचते, फिर ओपीडी लेते।

क्या करें डिग्री? क्या डिग्री के खर्चे?
पानीपुरी वाले थे अब इलाज लिखते!

चटनी, मसाला, सोंठ, टिक्की, समोसे,
सीधे मरीज़ों को हैं इंजेक्शन देते!

सोचा—फँस जाएँगे,
कभी तो धरे जाएँगे,
देख बेहाल खुद पे
हम गर्व कर पाएँगे।

नहीं फँसे तो भी
हम न पछताएँगे,
बापू को ही तब
गलत ठहराएँगे।

देखा इक रोज़अस्पताल में हमारे
ही मर्ज़ की दवा उन्हें लिखते।

सरकारी अस्पताल की OPD में
बैठे थे ऐंठ से, पहने उजले कपड़े।

देखे हैं हमने फ़र्ज़ी डॉक्टर बनते,
पानीपुरी बेचते, फिर ओपीडी लेते।

क्या करें डिग्री? क्या डिग्री के खर्चे?
पानीपुरी वाले थे अब इलाज लिखते!

चटनी, मसाला, सोंठ, टिक्की, समोसे,
सीधे मरीज़ों को हैं इंजेक्शन देते!

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