लगता है मुई उम्र हो आई,
लगता है मुई उम्र हो आई!
लगता है मुई उम्र हो आई!
इन नैनों से, इस स्माइल से,
बाग़-ए-बहार तक रुकवाई।
बहती हवा को ब्रेक लगवाई,
कितनी ही धड़कनें थमवाईं।
शायर के क़लम की कितनी
सरसराहटें तक हैं थमवाईं,
नग़मों की रानाई पर भी मेरे
जलवों से शामत थी आई।
जब कभी पलकें उठाती थी,
रात की सुबह हो जाती थी।
झुका लेती थी कभी इनको,
शाम भी दस्तक दे जाती थी।
जाने कितने जवाँ दिलों की
नींदें बेज़ा उड़ जाती थीं।
आईने के अक्स से मुझको
मुई बुरी नज़र लग जाती थी!
ज़ुल्फ़ से गिरता था जब पानी,
हाय! आशिक़ों की साँसें रुक जातीं।
हुस्न की खटास ऐसी थी मेरी,
समंदर के पानी को और
नमकीन बना कर जाती थी!
लगता है मुई उम्र हो आई!
लगता है मुई उम्र हो आई!
जब भी बजट बिगड़ जाता था,
सुर्ख़ लबों पे मुस्कान ले आती।
हो जाता था डेफिसिट ग़ायब,
बैलेंस शीट भी खिल जाती थी!
कायनात थम जाती थी और
चलती गाड़ियाँ टकरा जाती थीं।
बस को मैं इंतज़ार कराती थी,
धरती पर कभी ट्राई नहीं किया,
नीली छतरी तो झुक जाती थी!
आज क्या हुआ फिर मेरे दिल?
क्यों नज़रों के तीर चूक गए हैं?
ज़ाया गई आज की स्माइल,
कोई भी मेरा जादू नहीं चला!
ड्राइवर की तरफ़ “छू” किया,
मुई मेट्रो रेल ले चलता बना!
कहाँ गए वो तीर?
कहाँ गई तराश?
चंद्रमुखी तो मैं थी,
मगर न बना कोई देवदास!
ओह माय गॉड! अलास!
लगता है सखी, उम्र हो आई!
लगता है मुई उम्र हो आई!
