कीचड़ तो होगा! (KTH)

अंकल जी दुकान खोल रहे हैं,
डंडा हाथ में ले बुदबुदा रहे हैं।
अभी काले कुत्ते को भगाया है,
और लो—ग्राहक चला आया है!

कॉलोनी में अंकल की दुकान है,
सबसे उनकी जान-पहचान है।
लोग टाइमपास करने आते हैं,
तेज़ चैनल की ख़बरें दे जाते हैं।

अंकल हर तीर कमान में रखते हैं,
सही मौक़े पर छोड़ दिया करते हैं।
मोहल्ले की नस पहचानते हैं,
कौन क्या है—अंकल सब जानते हैं।

अरे-अरे… ग्राहक भी तो खड़ा है!

“राम-राम अंकल जी, ठीक तो हो?”
“राम-राम जी, सुनाओ क्या हाल हैं?”

[मन की बात]

ग्राहक: “उधार तो ले ही जाऊँगा।”
अंकल: “बच्चू, आज तो नहीं दूँगा!
पिछला इतना उधार बकाया है,
फिर मुँह उठाए चला आया है।
लीचड़!”

[साक्षात संवाद]

“रुको भाई, पहले कुत्तों का दूध
और पूजा-अर्चना कर लेने दो।
तब तक कुछ काम निपटा लो।”

“अंकल जी, टॉफ़ी तो खिला दो।”
“अंकल जी, शादी वाले घर की क्या ख़बर है?”

“बाऊजी, बड़े रिश्तेदार आए हैं।”

“हमें क्या! हमको तो जी बुलाया नहीं है,
कोई सामान भी मँगाया नहीं है।
हम तो काम से काम रखते हैं,
ऐसों के मुँह नहीं लगा करते हैं।”

“तुम्हें तो बुलाया ही होगा न?”

“हाँ अंकल, शादी आज ही है।”

“कमाल है! आपको नहीं बुलाया?
बोलूँ क्या उन्हें—क्यों नहीं बुलाया?”

“रहने दे, हम क्या गिरे पड़े हैं?
ऐसे तो छत्तीसों दर पे पड़े हैं।
नाक रगड़ें तब भी न जाएँगे,
घर का इनसे बढ़िया खाएँगे।”

“अच्छा… चलो, एक किलो चीनी दे दो,
दूध की थैली, एक मक्खन भी।
पैसे हिसाब में लिख लेना।”

“मुझे बात करनी पड़ेगी जी…”

“ठीक है… लेकिन तू कुछ मत बोलना।”


शाम को जब बारात आ गई,
गली में सुंदर टेंट सज गया।
खाने की सोंधी महक आई,
अंकल ने बाहर कुर्सी लगाई।

और गरियाना शुरू कर दिया—

“सालों ने कीचड़ कर रखा है!
बाराती हाथ धोएँ, कुल्ला करें—
सालों ने कीचड़ कर रखा है!”

घरवालों तक शिकायत गई—
“कोई खूसट बाहर आ बैठा है,
बारातियों को सताए जा रहा है!”

तभी ग्राहक भागता हुआ आया—

“अंकल, चलो जल्दी!”

“क्या हुआ?”

“आपको बुलाया है।
कहते हैं—अपनों को बुलाया जाता है क्या?
अंकल जी के बिना शादी कैसी?”

अंकल जी सहर्ष-ससम्मान गए,
मूँछों पर ताव दे जलपान किए।

जब बाहर हाथ-मुँह धोने आए,
कुर्सी घेरे अन्य बूढ़े सलोने पाए।

वैसे ही झल्लाते, गरियाते हुए—

“सालों ने कीचड़ कर रखा है!”

अंकल जी अपने प्रेम-मग्न थे,
दावत के स्वाद के वशीभूत थे।

प्रेम-विभोर मुस्काकर बोले—

“अंकल जी, शादी-ब्याह होगा,
तो थोड़ा कीचड़ भी होगा…”
लाज़मी है… कीचड़ तो होगा!”

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