नौकरी की चाकरी (Naukri Ki Chaakri)

बहुत गुज़रे दिन मन सलामी देते देते 
एक युग बीतने को है गुलामी खेते खेते

मिला जो अब सब तक टुकड़ों में मिला
मुट्ठी भर उजाला बाक़ी अँधेरा ही मिला 

परिवार के संग समय बिताया ही कहाँ
अपनों में बैठूं ये मौका मिला ही कहाँ

बच्चे छोटे थे जाने से कब बड़े हो गए
इस ज़द्दोज़हद में हम तो बूढ़े हो गए 

पडोसी मुझे बस अजनबी ही पाते हैं
अंकल सुबह शाम ही नज़र आते हैं

फुर्सत मिली है तो खुद से मिलूंगा मैं 
कुछ रोज़ खुद के लिए  जिऊंगा में

अब यारों से  तबीयत से मिलूंगा
अहंकारी नहीं मैं सब से कहूंगा

वज़ूद मेरा ज़रूरतें निगल गयीं थीं
मस्ती घड़ी के काँटों में फंस गयी थी

कल से नयी एक शुरुआत होगी 
हर बात में सिर्फ मेरी बात होगी

मेरी ज़मीं बस मेरा आसमां होगा
मेरा अपना सूरज चन्द्रमा होगा  

ज़िन्दगी है सफर कारवां और भी हैं
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

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