पत्थर (Patthar)

गला चीखता जाता था
पत्थर गुम सहमा सा था
गले बाकी पीछे चिल्लाते
संग में ताल मिलाते जाते
बाजा था सष्ठम सुर पर
मानो मानेंगे जान लेकर

सनातन की ही दुहाई थी
रात नींद नहीं आयी थी
ढोलक और सुर की भद
कुल रात ही पिटती रही
एक नाम पुकारे जाते थे
कुछ जंतर फूंकते जाते थे

गले ने जब मिसरा गाया
बाकी गलों को जोश आया
भूत भागे पिशाच चकराए
चड़ैलों ने भी ली अंगड़ाई
दुहाई हो दुहाई हो दुहाई
आवाज नेपथ्य से यूँ आई
देख रहा है उल्लू कहीं के
पड़े हैं मेरे प्राणों के पीछे

अपराध भी नहीं बताते हैं
थर्ड डिग्री बस दिए जाते हैं
कैसा मैं सर्वशक्तिमान हूँ
इनके खेलने का सम्मान हूँ
रोज़ दुकान ऐसे सजाते हैं
मेरे नाम पर खाये जाते हैं

मुझे बांधकर सारे बेसुरे
रोज़ यूँ ही सताए जाते हैं
जो अक्ल पर पत्थर पड़े हैं
गले सब मेरे गले पड़े हैं

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